हम जानते हैं कि समस्त सृष्टि मिलकर अब तक मानो प्रसव-पीड़ा में कराह रही है और सृष्टि ही नहीं, वरन् हम भी भीतर-ही-भीतर कराहते हैं। हमें तो पवित्र आत्मा मिल चुका है, जो परमेश्वर के कृपादानों का प्रथम फल है। लेकिन हम अपने शरीर की विमुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब हम परमेश्वर की दत्तक संतान होंगे। इस आशा में हमारा उद्धार हुआ है। यदि कोई वह बात देखता है, जिसकी वह आशा करता है, तो यह आशा नहीं कही जा सकती। मनुष्य जिस वस्तु को देख रहा है, उसकी आशा क्यों करेगा? हम उसकी आशा करते हैं, जिसे हम अब तक नहीं देख सके हैं। इसलिए हमें धैर्य के साथ उसकी प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
पवित्र आत्मा भी हमारी दुर्बलता में हमारी सहायता करता है। हम यह नहीं जानते कि हमें कैसे प्रार्थना करना चाहिए, किन्तु आत्मा स्वयं आहें भरकर—जो शब्दों द्वारा प्रकट नहीं की जा सकती हैं—हमारे लिए विनती करता है। परमेश्वर हमारे हृदय का रहस्य जानता है। वह समझता है कि आत्मा का अभिप्राय क्या है,क्योंकि आत्मा परमेश्वर की इच्छानुसार सन्तों के लिए विनती करता है।
हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसके उद्देश्य के अनुसार बुलाये गये हैं, परमेश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है; क्योंकि परमेश्वर ने निश्चित किया कि जिन्हें उसने पहले से अपना समझा, वे उसके पुत्र के प्रतिरूप बनाये जायेंगे, जिससे उसका पुत्र इस प्रकार बहुत-से भाई-बहिनों में पहिलौठा हो। उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है : जिन्हें बुलाया, उन्हें धार्मिक भी ठहराया है और जिन्हें धार्मिक ठहराया है, उन्हें महिमान्वित भी किया है।
और कहना ही क्या है? यदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो कौन हमारे विरुद्ध होगा? उसने अपने निजी पुत्र को भी नहीं बचाया, उसने हम सब के लिए उसे समर्पित कर दिया। तो, इतना देने के बाद, क्या वह हमें अपने पुत्र के साथ सब कुछ नहीं देगा? जिन्हें परमेश्वर ने चुना है, उन पर कौन अभियोग लगा सकेगा? जिन्हें परमेश्वर ने दोष-मुक्त कर दिया है, उन्हें कौन दोषी ठहरायेगा? क्या येशु मसीह ऐसा करेंगे? वह तो मर गये, बल्कि जी उठे और परमेश्वर के दाहिने हाथ विराजमान हो कर हमारे लिए निवेदन करते रहते हैं। कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग कर सकता है? क्या विपत्ति या संकट? क्या अत्याचार, भूख, नग्नता, जोखिम या तलवार? जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है, “तेरे कारण दिन-भर हमारा वध किया जाता है। हमें वध होने वाली भेड़ जैसा समझा गया।” किन्तु इन सब बातों में हम उन्हीं के द्वारा पूर्ण विजय प्राप्त करते हैं, जिन्होंने हमसे प्रेम किया है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मृत्यु न जीवन, न स्वर्गदूत न नरकदूत, न वर्तमान न भविष्य, न सामर्थ्यगण, न आकाश में या पाताल में कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई वस्तु हमें परमेश्वर के उस प्रेम से अलग कर सकती है, जो हमें हमारे प्रभु येशु मसीह द्वारा मिला है।