लूकस 6:1-11

लूकस 6:1-11 HINCLBSI

येशु किसी विश्राम के दिन गेहूँ के खेतों से हो कर जा रहे थे। उनके शिष्‍य अनाज की बालें तोड़ कर और उन्‍हें हाथ से मसल-मसल कर खाने लगे। कुछ फरीसियों ने कहा, “जो काम विश्राम के दिन मना है, तुम क्‍यों वही कर रहे हो?” येशु ने उन्‍हें उत्तर दिया, “क्‍या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उसके साथियों को भूख लगी, तब दाऊद ने क्‍या किया था? उसने परमेश्‍वर के भवन में जा कर भेंट की रोटियाँ उठा लीं, उन्‍हें स्‍वयं खाया तथा अपने साथियों को भी खिलाया। केवल पुरोहितों को छोड़ किसी और को उन्‍हें खाने की आज्ञा तो नहीं है।” तब येशु ने उनसे कहा, “मानव-पुत्र विश्राम के दिन का स्‍वामी है।” किसी दूसरे विश्राम के दिन येशु सभागृह में जा कर शिक्षा दे रहे थे। वहाँ एक मनुष्‍य था, जिसका दायाँ हाथ सूख गया था। शास्‍त्री और फरीसी इस बात की ताक में थे कि यदि येशु विश्राम के दिन किसी को स्‍वस्‍थ करें, तो वे उन पर दोष लगा सकें। यद्यपि येशु उनके विचार जानते थे, फिर भी उन्‍होंने सूखे हाथ वाले मनुष्‍य से कहा, “उठो और बीच में खड़े हो जाओ।” वह उठा और बीच में खड़ा हो गया। येशु ने उन से कहा, “मैं तुम से पूछता हूँ−विश्राम के दिन भलाई करना उचित है या बुराई, प्राण बचाना या नष्‍ट करना?” तब चारों ओर उन सब पर दृष्‍टि दौड़ा कर उन्‍होंने उस मनुष्‍य से कहा, “अपना हाथ बढ़ाओ।” उसने ऐसा ही किया और उसका हाथ अच्‍छा हो गया। वे बहुत नाराज हो गये और आपस में परामर्श करने लगे कि हम येशु का क्‍या करें।